गुरुवार, 25 अगस्त 2016

"भोर के रंग !"
जब जब बदलता है
भोर का रंग
हमारी उम्मीदें भी
रंगीन हो जाती हैं
विश्वास की एक कविता
मेरे अंदर
 सागर की लहरों सी
शब्दों की पतवार थाम कर
चलने लगती है
कहीं दूर पहुँच कर
सूरज का रंग जब
साँझ पर चढ़ने लगता है
हमें थाम कर
तब समय का हाथँ भी
नये कैनवास पर
नये आकार गढ़ने लगता है
तब बहुत याद आता है
मुझे हर माँ की आँखों में
हमें हर माँ की आँखों में
बच्चों के लिये जलता वह
रोशन दिया जो
उनके जीवन की
रोशनी बुनने के लिये
रात दिन कातता है
उमंगों का चरखा जिससे
निकले सूत
उनके इर्द गिर्द ऊर्जा की
एक सप्तरंगी डोर
लपेट कर उन्हें
सप्तरंगी आँचल में
 समेट लेते हैं
और बच्चे चहबच्चे से 
मुखर हो अपनी 
पहचान ढूंढनें लगते हैं 


डाँ सरस्वती माथुर 
२६.३.१६
2
हमें भी शामिल करो 
पृथ्वी की आबादी में 
हमने भी तो 
नापी हैं दूरियाँ 
जीवन में संघर्ष की 
फिर क्यों हमारे 
घर के चारों ओर 
कच्ची मिट्टी की दीवार 
चिन कर उसमें 
गाहे बगाहे छेद कर 
तांका झाँकी करते हो
फिर मारते हो झपटा
क्यों आख़िर क्यों
हम कोई चील के 

पंजों में दबोचे 
चहे तो नहीं ?
हमें भी अच्छी लगती है 
धूप ,नदियाँ,पेड़,फूल
और उत्सवी जीवन के रंग
हमारे भी सपने हैं 
हमारा भी एक 
सतरंगी आकाश है 
जिसमें उगते हैं 
सूरज -चाँद 
जिसमें चमकते हैं तारे
 होती है रोज़ सुबह -शाम
फिर क्यों जब भी हमारी 
जीत होने लगती है 
सह नहीं पाते हैं आप
और बखेर देते हैं 
हमारे सभी सपने 


कैरम की गोटियों की तरह 
अपनी बदनीयती व 
अहम स्ट्राइकर दाग कर 
कोई बात नहीं 
अब दूर नहीं है वे दिन जब 
आप देखेंगे कि 
अंधकार होगा तो
हमारी मुटठी में बंद 
जुगनू के घेरों से 
झरती रोशनी 
आपका मार्गदर्शन करेगी 
हमारी एक आवाज़ से 
आपकी रूह डरेगी 
लेकिन हम वादा करते हैं कि
जीवन के हर मोड़ पर
आपके साथ हम खड़े रहेंगे
पर अपने अस्तित्व -अस्मिता को
अपमानित नहीं होने देंगे
क़तई नहीं होने देंगे।
डाँ सरस्वती माथुर
२६.३.१६
3
तुम कितने ही
रास्ते बदलो
मैं मिल ही जाऊँगी
फूल सा है
वजूद मेरा
झरूँगी सूख कर
पर बीज बन कर फिर से
खिल ही जाऊँगी
तुम एक उत्सवपूर्ण मौसम हूँ मैं
आती जाती रहूँगी
रूप बदल बदल कर
कभी पतझड़ कभी
बसंत कभी फाल्गुन
कभी सावन कहलाऊँगी
एक अदृश्य
बाँसुरी हूँ मैं
नि:शब्द रहकर भी
जीवन के ख़ूबसूरत
 पलों में देखना
मौन तोड़ गीत मे
लय के उन्मुक्त रंजन में
एक नया राग सुना कर
पहचान बनाऊँगी
तुम सुर होंगे मेरे शब्द साज
मेरी ध्वनि हवाओं की में उतर अनुगूँज  सी
मैं दूर तक जाकर फिर